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जीवन एक दोतरफा प्रक्रिया है। हमें विभिन्न उत्तेजनाएं प्राप्त होती हैं और हम उनका जवाब देते रहते हैं। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘तत्व को जानने
जैसा कि हम नियमित रूप से प्रशंसा और अपमान से उत्पन्न होने वाली भावनाओं का अनुभव करते हैं, हम देखते हैं कि प्रशंसा हमें खुद को भुला देती है जैसे कि
हमारी इंद्रियां आधुनिक समय के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तरह हैं जो स्वचालित रूप से बाहरी उत्तेजनाओं से प्रभावित होते हैं जैसे ध्वनि के प्रति कान और प्रकाश के प्रति आंख और ये उत्तेजनाएं जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
प्रशंसा और अपमान जैसी उत्तेजनाओं के साथ हमारी पहचान ही बाधा है, जो जीवन भर चलने वाले कर्मबंधन पैदा करती है। इसलिए, श्रीकृष्ण हमें यह महसूस करने की सलाह देते हैं कि इंद्रियां यांत्रिक रूप से इंद्रिय विषयों के
By Siva Prasadजीवन एक दोतरफा प्रक्रिया है। हमें विभिन्न उत्तेजनाएं प्राप्त होती हैं और हम उनका जवाब देते रहते हैं। इस सन्दर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘तत्व को जानने
जैसा कि हम नियमित रूप से प्रशंसा और अपमान से उत्पन्न होने वाली भावनाओं का अनुभव करते हैं, हम देखते हैं कि प्रशंसा हमें खुद को भुला देती है जैसे कि
हमारी इंद्रियां आधुनिक समय के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तरह हैं जो स्वचालित रूप से बाहरी उत्तेजनाओं से प्रभावित होते हैं जैसे ध्वनि के प्रति कान और प्रकाश के प्रति आंख और ये उत्तेजनाएं जीवित रहने के लिए आवश्यक है।
प्रशंसा और अपमान जैसी उत्तेजनाओं के साथ हमारी पहचान ही बाधा है, जो जीवन भर चलने वाले कर्मबंधन पैदा करती है। इसलिए, श्रीकृष्ण हमें यह महसूस करने की सलाह देते हैं कि इंद्रियां यांत्रिक रूप से इंद्रिय विषयों के

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