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एक बार, मध्य एशिया से घोड़े पर सवार होकर एक आक्रमणकारी ने दिल्ली
इसी तरह, हमें आत्म निरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या हमारी खुशी
इस संबंध में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है’’ (5.23)। दूसरों से खुशी प्राप्त करने की इच्छा ही वासना है और क्रोध हमें तब होता है जब परिस्थितियां हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि ‘‘जो व्यक्ति अंतरात्मा में सुखवाला है, आत्मा में रमण
सेवा, दूसरों के प्रति करुणा के साथ स्वयं के बारे में जागरूकता प्राप्त करने के बारे में है। श्रीकृष्ण इंगित करते हैं कि कोई दूसरों की मदद तब कर सकता है जब वह जान जाता है कि काम और क्रोध के आवेगों में महारत हासिल करके
By Siva Prasadएक बार, मध्य एशिया से घोड़े पर सवार होकर एक आक्रमणकारी ने दिल्ली
इसी तरह, हमें आत्म निरीक्षण करने की आवश्यकता है कि क्या हमारी खुशी
इस संबंध में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि, ‘‘जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है’’ (5.23)। दूसरों से खुशी प्राप्त करने की इच्छा ही वासना है और क्रोध हमें तब होता है जब परिस्थितियां हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होती हैं।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं कि ‘‘जो व्यक्ति अंतरात्मा में सुखवाला है, आत्मा में रमण
सेवा, दूसरों के प्रति करुणा के साथ स्वयं के बारे में जागरूकता प्राप्त करने के बारे में है। श्रीकृष्ण इंगित करते हैं कि कोई दूसरों की मदद तब कर सकता है जब वह जान जाता है कि काम और क्रोध के आवेगों में महारत हासिल करके

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