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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘‘मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है’’ (6.5)। मित्रता की तरह इस अस्तित्वपरक श्लोक के अनेक आयाम हैं।
सबसे पहले, यह प्रत्येक व्यक्ति पर खुद को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी तय
दूसरे, यह अपनी पूर्णता और कमियों को अपनाकर अपने पछतावों को पार
तीसरा, जब हम अपने खुद के मित्र होते हैं, तो हमारे भीतर अकेलेपन के लिए कोई जगह नहीं होती जो अवसाद, क्रोध और किसी भी तरह की लत (पदार्थों या स्क्रीन) का मुख्य कारण है। यह हमें किसी पर निर्भर हुए बिना आनंदमय होने में मदद करती है, खासकर जब व्यक्ति वृद्धावस्था के नजदीक होता है।
अंत में, कहा जा सकता है कि यह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और
जब हम एक बार अपने आप से मित्रता कर लेते हैं, तो स्वाभाविक परिणाम यह है कि हम पूरी दुनिया के मित्र बन जाते हैं क्योंकि पूर्वाग्रहों और निर्णयों को छोडऩे से पूरी दुनिया भी हमारा मित्र बन जाती है।
By Siva Prasadश्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘‘मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है’’ (6.5)। मित्रता की तरह इस अस्तित्वपरक श्लोक के अनेक आयाम हैं।
सबसे पहले, यह प्रत्येक व्यक्ति पर खुद को ऊपर उठाने की जिम्मेदारी तय
दूसरे, यह अपनी पूर्णता और कमियों को अपनाकर अपने पछतावों को पार
तीसरा, जब हम अपने खुद के मित्र होते हैं, तो हमारे भीतर अकेलेपन के लिए कोई जगह नहीं होती जो अवसाद, क्रोध और किसी भी तरह की लत (पदार्थों या स्क्रीन) का मुख्य कारण है। यह हमें किसी पर निर्भर हुए बिना आनंदमय होने में मदद करती है, खासकर जब व्यक्ति वृद्धावस्था के नजदीक होता है।
अंत में, कहा जा सकता है कि यह शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और
जब हम एक बार अपने आप से मित्रता कर लेते हैं, तो स्वाभाविक परिणाम यह है कि हम पूरी दुनिया के मित्र बन जाते हैं क्योंकि पूर्वाग्रहों और निर्णयों को छोडऩे से पूरी दुनिया भी हमारा मित्र बन जाती है।

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