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श्रीकृष्ण ने उल्लेख किया कि जब कोई उनकी शरण लेकर मोक्ष के
हमारा अपना भौतिक शरीर लगातार बदलता रहता है। ऐसा अनुमान है
‘ब्रह्म’ की स्थिति को जानने के मार्ग में हमारी इन्द्रियाँ सबसे बड़ी बाधा हैं। वे ध्वनि, प्रकाश, गंध और स्पर्श के रूप में बाहरी दुनिया में होने वाले परिवर्तनों को महसूस करने के लिए विकसित हुई हैं। निस्संदेह, यह क्षमता जीवित रहने के लिए आवश्यक है, लेकिन साथ ही यह ‘अक्षरम’ को साकार करने में सहायक नहीं होतीं। ऐसा कहा जाता है कि ‘जो हमें यहां (जीवित) लाया है वह हमें वहां (ब्रह्म तक) नहीं ले जाएगा’। इसलिए श्रीकृष्ण कई अवसरों पर इंद्रियों के प्रति सावधान रहने के लिए कहतेे हैं।
यह अनित्यता को समझकर अनित्य को दूर करने के बारे में है। अंत में जो बचता है वह ‘अक्षरम’ है। यह एक झूलते हुए पेंडुलम में एक स्थिर धुरी या फिर एक घूमते हुए पहिये की स्थिर धुरी को महसूस करने जैसा है। यह अनित्य (सृजन) से आसक्त न होने और हमेशा शाश्वत (रचनात्मकता) पर दृष्टि रखने के बारे में है जो विविधता में एकता को महसूस करना है।
By Siva Prasadश्रीकृष्ण ने उल्लेख किया कि जब कोई उनकी शरण लेकर मोक्ष के
हमारा अपना भौतिक शरीर लगातार बदलता रहता है। ऐसा अनुमान है
‘ब्रह्म’ की स्थिति को जानने के मार्ग में हमारी इन्द्रियाँ सबसे बड़ी बाधा हैं। वे ध्वनि, प्रकाश, गंध और स्पर्श के रूप में बाहरी दुनिया में होने वाले परिवर्तनों को महसूस करने के लिए विकसित हुई हैं। निस्संदेह, यह क्षमता जीवित रहने के लिए आवश्यक है, लेकिन साथ ही यह ‘अक्षरम’ को साकार करने में सहायक नहीं होतीं। ऐसा कहा जाता है कि ‘जो हमें यहां (जीवित) लाया है वह हमें वहां (ब्रह्म तक) नहीं ले जाएगा’। इसलिए श्रीकृष्ण कई अवसरों पर इंद्रियों के प्रति सावधान रहने के लिए कहतेे हैं।
यह अनित्यता को समझकर अनित्य को दूर करने के बारे में है। अंत में जो बचता है वह ‘अक्षरम’ है। यह एक झूलते हुए पेंडुलम में एक स्थिर धुरी या फिर एक घूमते हुए पहिये की स्थिर धुरी को महसूस करने जैसा है। यह अनित्य (सृजन) से आसक्त न होने और हमेशा शाश्वत (रचनात्मकता) पर दृष्टि रखने के बारे में है जो विविधता में एकता को महसूस करना है।

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