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एक बार दो शत्रुओं ने प्रार्थना की और प्रभु उनके सामने प्रकट हुए। प्रभु ने दोनों को वरदान देना चाहा। पहले व्यक्ति ने दूसरे की इच्छाओं के बारे में जानना चाहा। परन्तु दूसरे व्यक्ति ने प्रभु से अनुरोध किया कि पहले वाले को पहले आशीर्वाद दें क्योंकि प्रभु वहां पहले प्रकट हुए थे। तब पहले व्यक्ति ने प्रभु से कहा कि दूसरे की अपेक्षा उसे दोगुना दे दें। दूसरा व्यक्ति जो शत्रुता से अंधा हो गया था, प्रार्थना किया कि वह एक आँख खो दे ताकि पहला व्यक्ति दोनों आँखें खो देगा; वह एक पैर खो दे ताकि पहला दोनों पैर खो देगा। हार-हार का यह खेल तब चलता है जब कोई अपनी ऊर्जा घृणा में लगाता है और इसीलिए कृष्ण ने पहले हमें घृणा छोडऩे के लिए कहा था, लेकिन कर्म नहीं
इस संबंध में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि दो शाश्वत मार्ग हैं जिनमें पहला
कृष्ण कहते हैं कि एक बार इन मार्गों को समझ लेने के बाद कोई भी भ्रमित नहीं होता (8.27)। यह समय और ऊर्जा का सदुपयोग है। वे आगे कहते हैं, ‘‘योगी पुरुष इस रहस्य को तत्व से जानकर वेदों के पढऩे में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निस्संदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है’’ (8.28)।
By Siva Prasadएक बार दो शत्रुओं ने प्रार्थना की और प्रभु उनके सामने प्रकट हुए। प्रभु ने दोनों को वरदान देना चाहा। पहले व्यक्ति ने दूसरे की इच्छाओं के बारे में जानना चाहा। परन्तु दूसरे व्यक्ति ने प्रभु से अनुरोध किया कि पहले वाले को पहले आशीर्वाद दें क्योंकि प्रभु वहां पहले प्रकट हुए थे। तब पहले व्यक्ति ने प्रभु से कहा कि दूसरे की अपेक्षा उसे दोगुना दे दें। दूसरा व्यक्ति जो शत्रुता से अंधा हो गया था, प्रार्थना किया कि वह एक आँख खो दे ताकि पहला व्यक्ति दोनों आँखें खो देगा; वह एक पैर खो दे ताकि पहला दोनों पैर खो देगा। हार-हार का यह खेल तब चलता है जब कोई अपनी ऊर्जा घृणा में लगाता है और इसीलिए कृष्ण ने पहले हमें घृणा छोडऩे के लिए कहा था, लेकिन कर्म नहीं
इस संबंध में, श्रीकृष्ण कहते हैं कि दो शाश्वत मार्ग हैं जिनमें पहला
कृष्ण कहते हैं कि एक बार इन मार्गों को समझ लेने के बाद कोई भी भ्रमित नहीं होता (8.27)। यह समय और ऊर्जा का सदुपयोग है। वे आगे कहते हैं, ‘‘योगी पुरुष इस रहस्य को तत्व से जानकर वेदों के पढऩे में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको निस्संदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परमपद को प्राप्त होता है’’ (8.28)।

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