Gita Acharan

206. गुणातीत का आचरण


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श्रीकृष्ण गुणातीत के आचरण के बारे में बताते हैं जो प्रकृति के तीन गुणों से ऊपर उठ गए हैं और कहते हैं, “वे जो सुख और दुःख में समान रहते हैं;जो आत्मा में स्थित हैं; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने के टुकड़े को समान मानते हैं; जो सुखद और अप्रिय घटनाओं में एक समान रहते हैं; जो बुद्धिमान हैं, जो निन्दा और प्रशंसा दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं; जो सम्मान और अपमान में एक समान रहते हैं; जो मित्र और शत्रु दोनों के साथ समान व्यवहार करते हैं; और जिन्होंने कर्तापन के सभी मोहों को त्याग दिया है - वे तीनोंगुणों से ऊपर उठ गए हैं" (14.24 और 14.25)। संकेत यह है कि गुणातीत समदर्शी होने के साथ-साथ द्वन्द्वातीत भी है।

जब इन्द्रियाँ इंद्रिय विषयों से मिलती हैं तो हमारे अंदर सुख और दुःख के द्वंद्व उत्पन्न होते हैं। श्रीकृष्ण ने पहले सलाह दी थी कि इन्हें अनदेखा करना सीखें क्योंकि ये क्षणिक हैं (2.14)। जीवन के अनुभव हमें बताते हैं कि द्वंद्व न केवल क्षणिक होते हैं बल्कि समय के साथ अपना स्वभाव भी बदलते हैं। विवाह का सुख तलाक के दुःख में बदल सकता है; एक मित्र शत्रु में बदल सकता है। जब हम अच्छे और बुरे; सुखद और अप्रिय द्वंद्वों का सामना करते हैं, उस समय समभाव बनाए रखना है।

जबकि घटनाएं प्रकृति में घटित होती हैं, हम उन्हें सुखद या दुःखद परिस्थितियों के रूप में व्याख्यायित करते हैं। हम दूसरों  के शब्दों को प्रशंसा या आलोचना के रूप में ग्रहण करते हैं, और परिवार तथा कार्यस्थल में अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए प्रशंसा और आलोचना - दोनों को साधन के रूप में उपयोग करते हैं। मूलतः, यह अपनी व्याख्याओं और मान्यताओं को त्यागने के बारे में है।

भगवद्गीता प्राथमिक कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर तक की पाठ्यपुस्तक है। ये श्लोक शुरुआती बच्चों के लिए भी समझने में बहुत आसान हैं। परंतु मूल बात यह है कि हम प्रत्येक परिस्थिति का विश्लेषण करके, और उन पूर्व अनुभवों पर मनन करके - जब हम प्रशंसा या आलोचना, सम्मान या अपमान से प्रभावित हुए थे - इन अंतर्दृष्टियों को अस्तित्वगत स्तर पर आत्मसात करें। हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक परिस्थिति को श्रीकृष्ण की लीला के रूप में देखना चाहिए।

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Gita AcharanBy Siva Prasad


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