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एक फल विकसित होने और पकने के लिए अपने मूल पेड़ से पोषक
परन्तु, एक पके फल को अपरिपक्व फल को पेड़ छोडऩे का लालच नहीं देना
इससे पहले श्रीकृष्ण ने कहा था, जो मूढ़बुद्वि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक उपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है (3.6)। ऐसे लोग खुद को भ्रमित कर रहे हैं और इनकी स्थिति उन अज्ञानियों की स्थिति से अलग नहीं है जिनके कार्यों को एक बुद्धिमान व्यक्ति के द्वारा जबरन रोक दिया गया था। इसका वर्णन उपरोक्त श्लोक (3.26) में किया गया है।
सौ छात्रों की एक कक्षा में, प्रत्येक छात्र एक ही पाठ को अपनी समझ और मन की स्थिति के आधार पर अलग-अलग तरीके से समझता है। इसी प्रकार, एक संन्यासी जो जीवन में प्रेरित कार्यों की निरर्थकता को समझ लिया है, उन्हें उस
श्रीकृष्ण ने अर्जुन में गीता सीखने की भूख के जगने का इंतजार किया। तब तक, श्रीकृष्ण ने उन्हें सांसारिक कार्यों को करने दिया, और जीवन में सुख-दु:ख से गुजरने दिया। उपयुक्त क्षण आने पर गीता का उपदेश दिया। इस प्रकार, सीखना तब होता है जब इसके लिए एक आंतरिक भूख होती है, जहां प्रत्येक चीज जिसे हम देखते हैं और जीवन की प्रत्येक स्थिति जिसका हम सामना करते हैं, वह शिक्षक बन सकती है।
By Siva Prasadएक फल विकसित होने और पकने के लिए अपने मूल पेड़ से पोषक
परन्तु, एक पके फल को अपरिपक्व फल को पेड़ छोडऩे का लालच नहीं देना
इससे पहले श्रीकृष्ण ने कहा था, जो मूढ़बुद्वि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक उपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है (3.6)। ऐसे लोग खुद को भ्रमित कर रहे हैं और इनकी स्थिति उन अज्ञानियों की स्थिति से अलग नहीं है जिनके कार्यों को एक बुद्धिमान व्यक्ति के द्वारा जबरन रोक दिया गया था। इसका वर्णन उपरोक्त श्लोक (3.26) में किया गया है।
सौ छात्रों की एक कक्षा में, प्रत्येक छात्र एक ही पाठ को अपनी समझ और मन की स्थिति के आधार पर अलग-अलग तरीके से समझता है। इसी प्रकार, एक संन्यासी जो जीवन में प्रेरित कार्यों की निरर्थकता को समझ लिया है, उन्हें उस
श्रीकृष्ण ने अर्जुन में गीता सीखने की भूख के जगने का इंतजार किया। तब तक, श्रीकृष्ण ने उन्हें सांसारिक कार्यों को करने दिया, और जीवन में सुख-दु:ख से गुजरने दिया। उपयुक्त क्षण आने पर गीता का उपदेश दिया। इस प्रकार, सीखना तब होता है जब इसके लिए एक आंतरिक भूख होती है, जहां प्रत्येक चीज जिसे हम देखते हैं और जीवन की प्रत्येक स्थिति जिसका हम सामना करते हैं, वह शिक्षक बन सकती है।

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