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अज्ञान के कारण व्यक्ति भौतिक संपत्ति को हड़पने में लगा रहता है जिससे कर्मबंधन में बंधता है। जब जागरूकता की पहली किरण उतरती है, तो वह त्याग के बारे में सोचने लगता है जैसे अर्जुन यहां कोशिश कर रहे हैं। भ्रम इस बात में है कि क्या त्याग करें। सामान्य प्रवृत्ति सभी कर्मों या कार्यों को त्याग करने की होती है, क्योंकि हम उन्हें हमेशा अपने विभाजन करने वाले मन से अच्छे या बुरे के रूप में विभाजन करते हैं और अवांछित कर्मों को छोडऩा चाहते हैं।
दूसरी ओर, श्रीकृष्ण त्याग के संबंध में एक अलग धारणा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, ‘‘जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी नित्यसंन्यासी ही समझने योग्य है, क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबंधन से मुक्त हो जाता है’’ (5.3)। पहली चीज जिसका
श्रीकृष्ण हमें द्वेष और इच्छाओं जैसी प्रवृत्तियों को त्यागने का परामर्श देते हैं। सच्चाई यह है कि कर्मों का कोई वास्तविक त्याग नहीं है क्योंकि हम एक कर्म का त्यागकर अपने गुणों के प्रभाव में दूसरे कर्म को करने लगते हैं। इसलिए हमें अपने बाहरी कर्मों के बजाय हमारे अंदर रहने वाले विभाजन को त्यागना चाहिए।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, ‘‘ज्ञानयोगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है
कर्म वह यंत्र है जो हमें यह पता लगाने में मदद करते हैं कि हम कितनी घृणा या इच्छाओं से भरे हुए हैं। इसलिए, श्रीकृष्ण कर्मों को त्यागने के बजाय निष्काम कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
By Siva Prasadअज्ञान के कारण व्यक्ति भौतिक संपत्ति को हड़पने में लगा रहता है जिससे कर्मबंधन में बंधता है। जब जागरूकता की पहली किरण उतरती है, तो वह त्याग के बारे में सोचने लगता है जैसे अर्जुन यहां कोशिश कर रहे हैं। भ्रम इस बात में है कि क्या त्याग करें। सामान्य प्रवृत्ति सभी कर्मों या कार्यों को त्याग करने की होती है, क्योंकि हम उन्हें हमेशा अपने विभाजन करने वाले मन से अच्छे या बुरे के रूप में विभाजन करते हैं और अवांछित कर्मों को छोडऩा चाहते हैं।
दूसरी ओर, श्रीकृष्ण त्याग के संबंध में एक अलग धारणा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं, ‘‘जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी नित्यसंन्यासी ही समझने योग्य है, क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबंधन से मुक्त हो जाता है’’ (5.3)। पहली चीज जिसका
श्रीकृष्ण हमें द्वेष और इच्छाओं जैसी प्रवृत्तियों को त्यागने का परामर्श देते हैं। सच्चाई यह है कि कर्मों का कोई वास्तविक त्याग नहीं है क्योंकि हम एक कर्म का त्यागकर अपने गुणों के प्रभाव में दूसरे कर्म को करने लगते हैं। इसलिए हमें अपने बाहरी कर्मों के बजाय हमारे अंदर रहने वाले विभाजन को त्यागना चाहिए।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं, ‘‘ज्ञानयोगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है
कर्म वह यंत्र है जो हमें यह पता लगाने में मदद करते हैं कि हम कितनी घृणा या इच्छाओं से भरे हुए हैं। इसलिए, श्रीकृष्ण कर्मों को त्यागने के बजाय निष्काम कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

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