पद, पैसे और झूठी शान के बशीभूत होकर हम अपनी तारीफ़ सुनने के इतने आदी हो जाते हैं कि सच्चाई या तो हम देख नहीं पाते या सच्चाई से मुँह फेर लेते हैं। हमारे भीतर का अहंकार हमें इतना अंधा कर देता है, कि हम कुछ भी देखना और सुनना नहीं चाहते। जो भी हमारे अहंकार को ठेस पहुँचाता है वह दुश्मन नज़र आता है, फिर चाहे वह कोई अपना ख़ास ही क्यों न हो। यह अहंकार एक दिन हमें ले डूबता है।
यदि हम अपने अंदर थोड़ी सी जागरुकता विकसित कर लें और चीज़ों का अवलोकन और विश्लेषण करें, आत्मावलोकन करें तो इससे बच सकते हैं।