इस कथा में हम जानेंगे कैसे रोग से उपद्रवित एक कुमार अपने आप को असह्य एवं अनाथ महसूस करते है और केवल धर्म को ही अपना सहायक जानकर युवावस्था में घर त्याग अण्गार बनते है और एक सम्राट को उद्बोधित करते है एवं मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करते है। इस प्रकार एक अनाथ अनाथ (अपनी आत्मा के स्वयं स्वामी बनते है)