अष्टावक्र गीता राजा जनक और अष्टावक्र जी के संवाद रूप में निबद्ध है । इस संवाद में चिंतन की गहराई की मनोहारी छाप दृष्टिगोचर होती है । आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले साधकों के लिए यह परमोपयोगी साबित होती है । कुल बीस प्रकरणों में यह विभक्त है ।
अष्टावक्र गीता राजा जनक और अष्टावक्र जी के संवाद रूप में निबद्ध है । इस संवाद में चिंतन की गहराई की मनोहारी छाप दृष्टिगोचर होती है । आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले साधकों के लिए यह परमोपयोगी साबित होती है । कुल बीस प्रकरणों में यह विभक्त है ।