अष्टावक्र गीता के इस अध्याय में राजा जनक अपने मन में उठे संशयों को अष्टावक्र जी के सामने रखते हैं। इसमें वे दृश्यमान प्रपंच और आत्मसत्ता को लेकर आश्चर्य प्रकट करते हैं।
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय में राजा जनक अपने मन में उठे संशयों को अष्टावक्र जी के सामने रखते हैं। इसमें वे दृश्यमान प्रपंच और आत्मसत्ता को लेकर आश्चर्य प्रकट करते हैं।