इस अध्याय में श्री अष्टावक्र जी राजा जनक को मनुष्य की अज्ञानता के बारे में बताते हैं। और उनको समझाते हैं कि यह कितने आश्चर्य की बात है कि सब कुछ जानने के बाद भी मनुष्य माया में फंसा रहता है।
इस अध्याय में श्री अष्टावक्र जी राजा जनक को मनुष्य की अज्ञानता के बारे में बताते हैं। और उनको समझाते हैं कि यह कितने आश्चर्य की बात है कि सब कुछ जानने के बाद भी मनुष्य माया में फंसा रहता है।