इस अध्याय में श्री अष्टावक्र जी राजा जनक को इस दृश्यमान जगत की असत्यता के बारे में बताते हुए कहते है कि तुम इसको जान कर मुक्त हो जाओ । वो कहते हैं कि शुद्ध स्वरूप में इस जगत का कोई अस्तित्व नहीं है। यह सब भ्रम है जो यह सत्य दिखाई पड़ रहा है।
इस अध्याय में श्री अष्टावक्र जी राजा जनक को इस दृश्यमान जगत की असत्यता के बारे में बताते हुए कहते है कि तुम इसको जान कर मुक्त हो जाओ । वो कहते हैं कि शुद्ध स्वरूप में इस जगत का कोई अस्तित्व नहीं है। यह सब भ्रम है जो यह सत्य दिखाई पड़ रहा है।