अध्यात्म की तीन अनिवार्य निष्ठाएं हैं। पहली यह कि हममें नैतिक मूल्यों के प्रति आस्था होना चाहिए। कभी सच तो कभी झूठ- इस प्रकार की अवसरवादी मनोवृत्ति और दम्भ से भरा विचार नहीं चलेगा। जीवन को कुछ बुनियादी सिद्धांतों-मूल्यों पर आधारित होना चाहिए, जो अपरिवर्तनीय हों, निरपेक्ष हों। दूसरा यह कि जीवमात्र की एकता और पवित्रता पर विश्वास होना चाहिए। तीसरी बात है, मृत्यु के पश्चात जीवन की अखंडता का स्वीकार। आत्मज्ञान में ये तीनों
बातें अनिवार्य हैं, इनके अलावा और भी कई बातें जोड़ी जा सकती हैं, परंतु इनमें से एक भी घटाई नहीं जा सकती। मृत्यु से जीवन खंडित नहीं होता। यह बाद में भी रहता है- चाहे सूक्ष्म रूप में रहे या स्थूल रूप में, निराकार में या साकार में, देहधारी नहीं तो देहविहीन रूप में ये भेद हो सकते हैं, लेकिन जीवन अखंड है। इंसान के जीने की क्रिया कितनी भी परिशुद्ध क्यों न हो, उसमें कुछ कर्मसंबंद्ध रहता ही है। कुछ विचार करने ही पड़ते हैं और कुछ विकार भी होते हैं। जहां हम अंदर की बात खोजने के लिए बैठते हैं, वहां ये सब चीजें बाहरी माननी चाहिए, यहां तक कि विचार भी इनसे अपने को अलग करने की शक्ति होनी
चाहिए। यही ब्रह्मविद्या का आरंभ है। -