सफलता दृढ़ आत्मविश्वास का ही प्रतिफल
बाजार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते है, पर मनुष्य के सम्बन्ध में उल्टा है। मनुष्य अपना मूल्यांकन करता है और जितना वह मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदापि नहीं मिलती। एक सामान्य परिवार से उठकर बेंजामिन डिजरायली जब इंग्लैण्ड के संसद सदस्य बने तो अन्य साथियों ने उनकी बड़ी उपेक्षा की। यहाँ तक कि वे जब बोलने के लिए उठते तो उन्हें बोलने भी नहीं दिया जाता।
पर इन परिस्थितियों में भी डिजरायली ने अपने लक्ष्य को नहीं छोड़ा। उसके प्रति अपनी दृढ निष्ठा को व्यक्त करते हुए उन सदस्यों से कहते जो उनसे भाषण में व्यवधान डाला करते थे कि आपको एक दिन मेरी बातें अवश्य सुनना पड़ेगी।
यह डिजरायली नहीं, उनका आत्मविश्वास बोल रहा था। उन्हें अपनी आन्तरिक शक्तियों पर विश्वास था वे अपना उचित मूल्यांकन करना जानते थे और इसी का परिणाम है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर वे एक दिन इंग्लैण्ड के प्रधानमन्त्री पद पर जा पहुँचे तथा जो लोग उनका उपहास करते थे वे ही उनके प्रशंसक और गुणगान करने वाले बन गये।
प्रत्येक व्यक्ति को यह मानकर चलना चाहिए कि परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में बनाया है और इस रूप में बनाते समय उसने मनुष्य की चेतना में सभी सम्भावनाओं के बीज डाल दिये हैं तथा उनके अकुरित होने की क्षमताएँ भी डाल दी हैं। पर प्रायः देखने में आता है हममें से अधिकांश व्यक्ति अपनी उन सुषुप्त क्षमताओं और सम्भावना के बीजों को विकसित तथा
अंकुरित करने की चेष्टा तो दूर रही उनके सम्बन्ध में विचार तक करना नहीं चाहते।
कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जिन्हें अनपेक्षित कहा जा सकता है और उनका उपयोग करने से भी हम संकोच करने लगते हैं। एक घटना नैपोलियन के एक सैनिक से सम्बन्धित है कहा जाता है कि उस सैनिक को नैपोलियन के पास कोई महत्त्वपूर्ण सन्देश लेकर भेजा गया था। सन्देश इतना महत्त्वपूर्ण था कि जितनी जल्दी हो सके पहुँचाने की बात भी उसके साथ जुड़ी हुई थी। सौंपे गये दायित्व को तत्परता से पूरा करने के लिए उस सैनिक ने अपना घोड़ा इतनी तेजी से दौड़ाया कि गन्तव्य स्थल पर पहुँचते ही उसके घोड़े ने दम तोड़ दिया। नैपोलियन ने उसकी कर्त्तव्य निष्ठा को सराहा तथा पत्र का उत्तर देकर उसी शीघ्रता से ले जाने को कहा। नैपोलियन को मालूम था कि सैनिक का घोड़ा मर चुका है। अतः वह बोला यह लो मेरा घोड़ा और जल्दी से यह उत्तर ले जाओ।' सैनिक भौचक्का होकर अपने सेनापति की ओर देखने लगा। लेकिन श्रीमान् सिपाही अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि नैपोलियन ने बीच में ही टोककर कहां "मैं जानता हूँ कि तुम क्या कहना चाहते हो पर याद रखो कि दुनियाँ का कोई घोड़ा ऐसा नहीं कि उसकी सवारी तुम न कर सको।"