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प्रतिस्पर्धा के दौर में हर कोई एक-दूसरे से आगे निकलने की अंधी दौड़ में लगा है। पद, पैसा, ऐशो-आराम हर कोई चाहता है। दिन भर हम दो और दो पाँच करने की कोशिश में लगे रहते हैं। काम की व्यस्तता में न खाने का समय है और न ही आराम का। एक बार काम मिल जाने के बाद कुछ भी नया सीखने और अपनी कुशलता को नई धार देने के बारे में हम सोचते भी नहीं। धीरे-धीरे हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ख़राब हो जाता है, काम करने की क्षमता कम होने लगती है, और हम प्रतियोगिता से बाहर होते जाते हैं। निरंतर बदलती दुनिया में यदि तरक्क़ी करनी है तो हमें बीच-बीच में काम से अवकाश लेकर अपनी कुल्हाड़ी को धार लगाते रहना होगा।
By Manoj Shrivastavaप्रतिस्पर्धा के दौर में हर कोई एक-दूसरे से आगे निकलने की अंधी दौड़ में लगा है। पद, पैसा, ऐशो-आराम हर कोई चाहता है। दिन भर हम दो और दो पाँच करने की कोशिश में लगे रहते हैं। काम की व्यस्तता में न खाने का समय है और न ही आराम का। एक बार काम मिल जाने के बाद कुछ भी नया सीखने और अपनी कुशलता को नई धार देने के बारे में हम सोचते भी नहीं। धीरे-धीरे हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ख़राब हो जाता है, काम करने की क्षमता कम होने लगती है, और हम प्रतियोगिता से बाहर होते जाते हैं। निरंतर बदलती दुनिया में यदि तरक्क़ी करनी है तो हमें बीच-बीच में काम से अवकाश लेकर अपनी कुल्हाड़ी को धार लगाते रहना होगा।