हर बसंत पतझड़ के बाद एक नयी बायार का आगाज़ करता है। प्रकृति फ़िर से नवोदित रूप में पेश आती है। लेकिन सर के बालों की कुछ और ही कहानी है। सामाजिक जीवन में बालों के ऊपर की बातें इसी बात को पुख़्ता करता है कि लाख दावों के बाद भी समाज अभी रंग रूप, कद-काठी से ऊपर नहीं पहुंच पाया।
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