Ruhaani Poems

बेबस मोहब्बत


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हैलो दोस्तों मैं सुमन राकेश शाह इक लंबे अंतराल के बाद इक बार फिर हूँ आपके साथ,  बेशक आप सभी ने दिवाली की छुट्टियों का आनंद लिया होगा मेरी शुभकामना है कि आपका नया इसी तरह हंसी खुशी बीते… 
कल मैंने इक पुरानी movie देखी थी केदारनाथ, 
इतनी लाचार मोहब्बत देख के सोचने लगी …कि 
सरहदें और धर्म तो इंसानों ने बनाए 
और प्रेम ईश्वर का आशीर्वाद 
फिर भी न जाने क्यूँ हर बार,  
ईश्वर को इंसान से हारना पड़ता है ...सुमन
और उसी पर कुछ लिखा है 
कैसी लाचार मुहब्बत है, ना पंख है, ना जुबां
न स्वछंद आसमां में उड़ती, न मैदानों में दौडती है
अकेले ऊंचे पहाड़ों में गूंजकर लौट आती है 
फिर वहीं उनके पास, सुनने वाला कोई भी नही 
ये पहाड़ गवाह बने मगर हमेशा खामोश ही रहे
सैकड़ों सालों से मंज़िल की तलाश में भटकती
मुहब्बत को छुआ था इन्हीं हवाओं ने, 
नदी, पहाड़, फ़िजा सब वहीं थे ज्यों के त्यों
बनते रहे है बेबस मुहब्बत के गवाह 
कितने ही सुलगते अरमान समा गए इनमें
मगर ये खामोश खड़े है अचल, बहते रहे है अविरल
और बेबस मुहब्बत हार के दम तोड़ देती हैं
या खामोशी में घुट के जी लेती है ..सुमन
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Ruhaani PoemsBy Suman Rakesh Shah