बिकता सब है हुनर, सेवा, सनसनी, ज्ञान, तमाशा। वक़्त अब बाजारवाद का है। मुफ़्त में अब कुछ नहीं मिलता। चायपत्ती के पैकेट के साथ बिस्कुट मुफ़्त पाने के लिए चायपत्ती भी खरीदनी ही पड़ती है। घर से बाहर आपका सुनिश्चित दाम है अब चाहे ध्याड़ी कहें या सैलरी। यही हाल खबरों और मीडिया का भी है।
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