Alfaaz

Bulandi


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दूर तक फैला समंदर...कूद पड़ मजदार मे...हिमाते मर्दा ए बन्दे...रह खुद बन जाएगी...औकात तो मन का वहम है...
आज भुज फैला के देखा...जो वर्ज हो प्रहार तो...चट्टान क्या टिक पायेगी
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