डॉक्टर कमरे से बहार आये उन्होंने नंदा बल्लभ से कहा चिंता न करें आपके पिता अब बिलकुल ठीक हैं और मैं उनकी देखभाल अपने पिता की तरह करूँगा आप निश्चिंत रहिये नंदा बल्लभ बधाणी संस्कृतिक समिति जो की एक सामाजिक समिति है में पधाधिकारी है और यह समिति पहाड़ के संस्कृतिक धरोहर को संजोने और संगरक्षण पर कार्य करती है
यह कहानी है एक पागल जिसका नाम रविंदर है वह कहाँ से आया कुछ नहीं पता परन्तु वह पिछले लगभग १० सालों से थराली में ही रह रहा है क्यूंकि उसका रहने खाने का कोइ प्रबंध नहीं है वह पागल है लोग तरस खा कर उसे झूठा, बासी और बचा हुवा खाना दे ही देते हैं और वह सड़क के किनारे बनी दुकानों के शेड या फिर टैक्सी स्टैंड पर रहता था
थराली चमोली गढ़वाल की एक तहसील है थराली के कोटडीप में राजकीय इंटर कॉलेज है और साथ ही है हमारी बधाणी सांस्कृतिक समिति का ऑफिस
अभी हाल ही में राजकीय इंटर कॉलेज की नई बिल्डिंग बन गयी है और पुरानी क्क्षाओं जो की मट्टी पत्थर और टिन शेड की बनी हैं को ऐसे ही छोड़ दिया गया है वेसे भी ये विद्यालय की प्रांगण से बहार हैं बधाणी सांस्कृतिक समिति अपने सांस्कृतिक कार्यक्रोम के अभ्यास के लिए इन में एक क्क्षा का प्रयोग करती है
कहते हैं संगीत में बहुत ताकत होती है क्या पशु क्या पक्षी और फिर रविंदर था तो इन्सान है भले ही पागल हो वह भी संगीत सुनने वहां आ जाता था
न जाने उसके विकृत मस्तिक के हिस्से में संगीत कैसा असर करता था की वह खुश हो कर झूम उठता था कई बार तो अभ्यास करने आये बच्चे जान बूज कर संगीत बजाते थे और उस पागल को नचाने का प्रयास करते थे और आनंद लेते थे
क्यूंकि आजकल अभ्यास रोज ही हो रहे थे तो वह भी वहीँ खली पड़ी क्क्षा में रहने लगा जब वह बाजार में था तो वह खाने के लिए होटल पर निर्भर था अब वह समिति के भोजनालय पर निर्भर हो गया पर समिति में भोजन केवल दिन में और कभी कभी रात को भी बनाया जाता था
नंदा बल्लभ जो समिति का ही पदाधिकारी है को रविंदर पर बहुत दया आती है इसलिए वह उसके खाने पीने का विशेष धयान रखता है नंदा बल्लभ ने संस्था के भोजनालय से रविंदर को एक पुरानी थाली और गिलास खाना खाने के लिए दे रखा है और अचरज की बात है की रविंदर केवल उसी की बात मानता है उसका नाम रविंदर ही है या कुछ और कोई नहीं जनता पर सब उसे रविंदर ही बुलाते हैं
महीने में एक दिन तो नंदा उसे नहला ही देता था और उसे अपने घर से लाकर या किसे लेकर पुराने कपडे पहन ने के लिए दिया करता था और उसके उतारे हुए कपडे जला दिया करता था वह ही उसके बाल और दाड़ी भी बनवा दिया करता था दया तो रविंदर पर सब दिखाते थे पर वह दया केवल बातों तक ही सीमित थी
थराली एक पहाड़ी जगह तो है ही और पिंडर नदी के किनारे बसा है सर्दियों में नदी की बहुत ही ठंडी हवा चलती और ठण्ड को कई अधिक बड़ा देती है
बारिश और सर्दी में कभी कभी बर्फ भी वहां जीना मुस्किल कर देती है जिन लोगों के घर हैं वो तो आग जलाकर और दरवाज खिड़की बंद कर कर अपने को गर्म रखते हैं
जबकि रविंदर बिना बिजली के घुप अँधेरे में मट्टी के सीलन भरी दीवारों के बीच केसे रहता है
जब बरसात और बर्फ़बारी के दिन होते हैं तो ठण्ड तो बहुत होती ही है पर समिति का भोजनालय और कार्यालय भी बंद रहता है न जाने वो दिन बिना भोजन के वह केसे दिन बिताता है
शायद आसपास और पड़ोस के लोगों से कुछ मांग लाता होगा या फिर लोग उसे वाही आकार दे जाते होंगे
कड़ाके की ठण्ड में भी धुल से सनी गन्दी दाड़ी मूछों के बीच मैंने हमेसा उसके होटों पर एक मुस्कराहट ही देखी
कुल मिलकर यदि बात की जाये तो वह थराली में अकेले ही था और साथ के नाम पर शायद नंदा बल्लभ ही उसकी थोड़ी बहुत देखभाल किया करता था
एक दिन की बात है शाम के लगभग 3.30 बजे होगे सांस्कृतिक कार्यक्रम का अभ्यास चल रहा था और रविन्द्र भी उसका आनंद ले रहा था अचानक रविंदर का पैर पत्थर में उलझा और वह नीचे गिर गया और उसके माथा सीधा जमीन में लगा और उससे खून बहने लगा
वह जोर जोर से रोने लगा आज तक किसी ने रविंदर को रोते नहीं देखा था और सभी का ध्यान रविंदर पर ही था नंदा ने तुरंत ही रविंदर के माथे पर एक कपडा रखा और उसे सीधे स्वस्थ्य केंद्र ले गया
स्वस्थ केंद्र अभ्यास स्थान से 500 मीटर की दूरी पर ही था जब वो रविन्द्र को लेकर स्वस्थ केंद्र पहुंचे तो डॉक्टर जा चुके थे उस समय केवल एक कोम्पोंडर ही था उसने रविन्द्र की चोट