पुरानी यादों के धागों को पकड़कर कहानियां बनुना अमृता प्रीतम की अनूठी शैली थी. कहानी एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना इस कहानी को पढ़ते हुए आप उनकी इस शैली से परिचित होंगे. पाठकों से बतियाते हुए कहानियां लिख देना यह अमृता प्रीतम ही कर सकती थीं.
‘‘पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी…’’ पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी ख़ुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी.
एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था. एक मुठ्ठी में उसने मां की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था. मां कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ़ बढ़कर कोई चीज़ ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर पड़ जाता था. उस स्त्री ने अपने बच्चे की मुठ्ठी खोलकर पालक के पत्तों को छुड़ाते हुए घूरकर देखा, पर उसके होंठों की हंसी उसके चेहरे की सिल्वटों में से उछलकर बहने लगी. सामने पड़ी हुई सारी तरकारी पर जैसे उसने हंसी छिड़क दी हो और मुझे लगा, ऐसी ताज़ी सब्ज़ी कभी कहीं उगी नहीं होगी.
कई तरकारी बेचनेवाले मेरे घर के दरवाज़े के सामने से गुज़रते थे. कभी देर भी हो जाती, पर किसी से तरकारी न ख़रीद सकती थी. रोज़ उस स्त्री का चेहरा मुझे बुलाता रहता था.
उससे ख़रीदी हुई तरकारी जब मैं काटती, धोती और पतीले में डालकर पकाने के लिए रखती-सोचती रहती, उसका पति कैसा होगा! वह जब अपनी पत्नी को देखता होगा, छूता होगा, तो क्या उसके होंठों में पालक का, टमाटरों का और हरी मिर्चों का सारा स्वाद घुल जाता होगा?
कभी-कभी मुझे अपने पर खीझ होती कि इस स्त्री का ख़्याल किस तरह मेरे पीछे पड़ गया था. इन दिनों मैं एक गुजराती उपन्यास पढ़ रही थी. इस उपन्यास में रौशनी की लकीर-जैसी एक लड़की थी-जीवी. एक मर्द उसको देखता है और उसे लगता है कि उसके जीवन की रात में तारों के बीज उग आए हैं. वह हाथ लम्बे करता है, पर तारे हाथ नहीं आते और वह निराश होकर जीवी से कहता है, ‘‘तुम मेरे गांव में अपनी जाति के किसी आदमी से ब्याह कर लो. मुझे दूर से सूरत ही दिखती रहेगी.’’ उस दिन का सूरज जब जीवी देखता है, तो वह इस तरह लाल हो जाता है, जैसे किसी ने कुंवारी लड़की को छू लिया हो कहानी के धागे लम्बे हो जाते हैं, और जीवी के चेहरे पर दु:खों की रेखाएं पड़ जाती हैं इस जीवी का ख़्याल भी आजकल मेरे पीछे पड़ा हुआ था, पर मुझे खीझ नहीं होती थीं, वे तो दु:खों की रेखाएं थीं, वही रेखाएं जो मेरे गीतों में थीं, और रेखाएं रेखाओं में मिल जाती हैं पर यह दूसरी जिसके होंठों पर हंसी की बूंदें थीं, केसर की तुरियां थीं.
दूसरे दिन मैंने अपने पांवों को रोका कि मैं उससे तरकारी ख़रीदने नहीं जाऊंगी. चौकीदार से कहा कि यहां जब तरकारी बेचनेवाला आए तो मेरा दरवाज़ा खटखटाना दरवाज़े पर दस्तक हुई. एक-एक चीज़ को मैंने हाथ लगाकर देखा. आलू-नरम और गड्डों वाले. फरसबीन-जैसे फलियों के दिल सूख गए हों. पालक-जैसे वह दिन-भर की धूल फांककर बेहद थक गई हो. टमाटर-जैसे वे भूख के कारण बिलखते हुए सो गए हो. हरी मिर्चें-जैसे किसी ने उनकी सांसों में से ख़ुशबू निकाल ली हो, मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया. और पांव मेरे रोकने पर भी उस तरकारी वाली की ओर चल पड़े.
आज उसके पास उसका पति भी था. वह मंडी से तरकारी लेकर आया था और उसके साथ मिलकर तरकारियों को पानी से धोकर अलग-अलग रख रहा था और उनके भाव लगा रहा था. उसकी सूरत पहचानी-सी थी इसे मैंने कब देखा था, कहां देखा था-एक नई बात पीछे पड़ गई.
‘‘बीबी जी, आप!’’
‘‘मैं… पर मैंने तुम्हें पहचाना नहीं.’’
‘‘इसे भी नहीं पहचाना? यह रत्नी!’’
‘‘माणकू रत्नी.’’ मैंने अपनी स्मृतियों में ढूंढ़ा, पर माणकू और रत्नी कहीं मिल नहीं रहे थे.
‘‘तीन साल हो गए हैं, बल्कि महीना ऊपर हो गया है. एक गांव के पास क्या नाम था उसका आपकी मोटर ख़राब हो गई थी.’’
‘‘हां, हुई तो थी.’’
‘‘और आप वहां से गुज़रते हुए एक ट्रक में बैठकर धुलिया आए थे, नया टायर ख़रीदने के लिए.’’
‘‘हां-हां.’’और फिर मेरी स्मृति में मुझे माणकू और....