Gauri Subhadra Kumari Chauhan
गौरी सुभद्रा कुमारी चौहान
शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चला गया और वह पास ही पड़ी, एक आराम कुर्सी पर जिसके स्प्रिंग खुलकर कुछ ढीले होने के कारण इधर-उधर फैल गए थे, गिर से पड़े। उनके इस प्रकार बैठने से कुछ स्प्रिंग आपस में टकराए, जिससे एक प्रकार की झन-झन की आवाज़ हुई। पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा फिर भौं-भौं करके भौंक उठा। इसी समय उनकी पत्नी कुंती ने कमरे में प्रवेश किया। काम की सफलता या असफलता के बारे में कुछ भी न पूछकर कुंती ने नम्र स्वर में कहा, "चलो हाथ-मुंह धो लो, चाय तैयार है।
'चाय', राधाकृष्ण चौंक से पड़े, "चाय के लिए मैंने नहीं कहा था।"
"नहीं कहा था तो क्या हुआ, पी लो।" कुंती ने आग्रहपूर्वक कहा।
"अच्छा चलो", कहकर राधाकृष्ण कुंती के पीछे-पीछे चले गए।
गौरी, अपराधिनी की भाँति, माता-पिता दोनों की दृष्टि से बचती हुई, पिता के लिए चाय तैयार कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि पिता की सारी कठिनाइयों की जड़ वही है। न वह होती और न पिता को उसके विवाह की चिन्ता में, इस प्रकार स्थान-स्थान घूमना पड़ता। वह मुँह खोलकर किस प्रकार कह दे कि उसके विवाह के लिए इतनी अधिक परेशानी उठाने की आवश्यकता नहीं। माता-पिता चाहे जिसके साथ उसकी शादी कर दें, वह सुखी रहेगी। न करें तो भी वह सुखी है। जब विवाह के लिए उसे जरा भी चिन्ता नहीं, तब माता-पिता इतने परेशान क्यों रहते हैं–गौरी यही न समझ पाती थी। कभी-कभी वह सोचती–क्या मैं माता-पिता को इतनी भारी हो गयी हूँ? रात-दिन सिवा विवाह के उन्हें और कुछ सूझता नहीं। तब आत्मग्लानि और क्षोभ से गौरी का रोम-रोम व्यथित हो उठता। उसे ऐसा लगता कि धरती फटे और वह समा जाय, किन्तु ऐसा कभी न हुआ।
गौरी, वह जो पूनो के चाँद की तरह बढ़ना भर जानती थी, घटने का जिसके पास कोई साधन न था, बाबू राधाकृष्ण के लिए चिंता की सामग्री हो गई थी। गौरी उनकी एकमात्र संतान थी। उसका विवाह वे योग्य वर के साथ करना चाहते थे, यही सबसे बड़ी कठिनाई थी। योग्य पात्र का मूल्य चुकाने लायक उनके पास यथेष्ट संपत्ति न थी। यही कारण था कि गौरी का यह उन्नीसवाँ साल चल रहा था। फिर भी वे कन्या के हाथ पीले न कर सके थे। गौरी ही उनकी अकेली संतान थी । छुटपन से ही उसका बड़ा लाड़-प्यार हुआ था । प्राय: उसके उचित-अनुचित सारे हठ पूरे हुआ करते थे । इसी कारण गौरी का स्वभाव निर्भीक, दृढ़-निश्चयी और हठीला था । वह एक बार जिस बात को सोच-समझकर कह दे, फिर उस बात से उसे कोई हटा नहीं सकता था । पिता की परेशानियों को देखते हुए अनेक बार उसके जी में आया कि यह पिता से साफ-साफ पूछे कि आखिर वे उसके विवाह के लिए इतने चिंतित क्यों हैं ? वह स्वयं तो विवाह को इतना आवश्यक नहीं समझती । और अगर पिता विवाह को इतना अधिक महत्त्व देते हैं, तो फिर पात्र और कुपात्र क्या ? विवाह करना है कर दें, किसी के भी साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी । उनकी यह परेशानी, इतनी चिंता अब उससे सही नहीं जाती । किंतु संकोच और लज्जा उसकी जबान पर ताला-सा डाल देते । हजार बार निश्चय करके भी वह पिता से यह बात न कह सकी ।
पिता को आते देख, गौरी चुपके से दूसरे कमरे में चली गई । राधाकृष्ण बाबू ने जैसे बेमन से हाथ-मुँह धोया और पास ही रखी एक कुरसी पर बैठ गए । वहीं एक मेज पर कुन्ती ने चाय और कुछ नमकीन पूरियाँ पति के सामने रख दीं । पूरियों की तरफ राधाकृष्ण ने देखा भी नहीं । चाय का प्याला उठाकर पीने लगे ।
ऐसी कन्या को जन्म देकर, जिसके लिए वर ही न मिलता हो, कुन्ती स्वयं ही जैसे अपराधिन हो रही थी । कुन्ती ने डरते-डरते पूछा, जहाँ गए थे क्या वहाँ भी कुछ ठीक नहीं हुआ ?
-ठीक ! ठीक होने को वहाँ धरा ही क्या है, चाय का घूँट गले से नीचे उतारते हुए बाबू राधाकृष्ण ने कहा, सब हमीं लोगों पर है । विवाह करना चाहें तो सब ठीक है, न करना चाहें तो कुछ भी ठीक नहीं है।
कुन्ती ने उत्सुकता से पूछा, फिर क्या बात है, लड़के को देखा?
-हाँ देखा, अच्छी तरह देखा हूँ ! कह राधाकृष्ण फिर चाय पीने लगे । कुन्ती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा, 'जरा समझाकर कहो । तुम्हारी बात तो समझ में ही नहीं आती ।'
राधाकृष्ण ने कहा, "समझाकर कहता हूँ, सुनो। वह लड़का, लड़का नहीं आदमी है। तुम्हारी गौरी के साथ मामूली चपरासी की तरह दिखेगा। बोलो करोगी ब्याह?''
कुंती बोली, ''विवाह की बात तो पीछे होगी। क्या रूप-रंग बहुत खराब है ? फोटो में तो वैसा नहीं जान पड़ता।"
राधाकृष्ण ने कहा, "रूप-रंग नहीं, रहन-सहन बहुत खराब है