https://youtu.be/uvipo9130ao Ginni Rabindranath Tagore
गिन्नी रबीन्द्रनाथ टैगोर
हमारे पंडित शिवनाथ छात्रवृत्ति कक्षा से दो-तीन क्लास नीचे के अध्यापक थे। उनके दाढ़ी-मूँछ नहीं थी, बाल छँटे हुए थे और चोटी छोटी-सी थी। उन्हें देखते ही बच्चों की अन्तरात्मा सूख जाती थी।
प्राणियों में देखा जाता है कि जिनके दंश होता है उनके दाँत नहीं होते। हमारे पंडित महाशय के दोनों एक साथ थे। एक तरफ से चाँटे, थप्पड़, मुक्के ऐसे बरसाते जैसे छोटे पौधों पर ओले बरसते हैं, दूसरी तरफ से तीखे वाक्यों की आग से प्राण बाहर आने को हो जाते।
इनका आक्षेप था कि अब पुराने ज़माने की तरह गुरु-शिष्य सम्बन्ध नहीं रहा; अब छात्र गुरुओं की देवता के समान भक्ति नहीं करते; यह कहकर अपनी उपेक्षित महिमा बच्चों के दिमाग में बलपूर्वक भरते थे; और बीच-बीच में हुंकार उठते थे, पर उसमें इतनी छोटी बातें मिली रहती थीं कि उन्हें देवता की गर्जना मानने का भ्रम कोई नहीं कर सकता था। अगर वज्रनाद की तरह गर्जना से बाप को गाली दी जाए, तो उसके पीछे छिपी बंगाली की क्षुद्रता फौरन पकड़ में आ जाएगी।
जो भी हो, हमारे स्कूल के इस तीसरी कक्षा के दूसरे विभाग के देवता को कोई इन्द्र चन्द्र वरुण या कार्तिक मानने का भ्रम नहीं कर सकता; सिर्फ एक देवता के साथ उनका सादृश्य माना जा सकता है, और उनका नाम है यम; और इतने दिन बाद स्वीकार करने में न डर है न दोष, कि हम मन-ही-मन यह कामना करते थे कि उपरोक्त देवता के यहाँ जाने में उन्हें और देर न हो।
पर यह अच्छी तरह समझ में आ गया था कि नरदेवता जैसा दुष्ट कुछ नहीं है। स्वर्ग में रहनेवाले देवता कोई उपद्रव नहीं करते। पेड़ पर से एक फूल तोड़कर दे दो तो खुश हो जाते हैं, न दो तो तकाज़ा करने नहीं आते। हमारे नरदेवता गण बहुत ज्यादा चाहते हैं, और हमारी तिलभर भूल होते ही दोनों आँखें खून के से लाल रंग को करके डाँटने आते, तब वे किसी तरह देवता जैसे नहीं दिखते।
बच्चों को तंग करने के लिए हमारे शिवनाथ पंडित के पास एक अस्त्र था, वह सुनने में जितना मामूली लगता था, उतना ही भयानक था। वे लड़कों के नये नाम रखते थे। नाम चीज़ तो सिर्फ शब्द है और कुछ नहीं किन्तु अधिकतर लोग अपने से ज्यादा अपने नाम को प्यार करते हैं; अपने नाम के प्रचार के लिए लोग क्या-क्या कष्ट नहीं सहते, यहाँ तक कि नाम को बचाने के लिए लोग अपने आप मरने में भी नहीं झिझकते।
ऐसे नाम के प्रेमी मनुष्य के नाम को विकृत कर देने से उसके प्राणों से प्रिय स्थान पर आघात पहुँचाना होता है। यहाँ तक कि जिसका नाम भूतनाथ है उसे अगर नलिनीकान्त बुलाओ तो भी उसे असहा लगता है।
इससे यह पता चलता है कि मनुष्य वस्तु से अवस्तु को ज्यादा मूल्यवान समझता है, सोने से ज्यादा वाणी, प्राणों से अधिक मान और अपने से ज्यादा अपने नाम को बड़ा समझता है।
मानव-स्वभाव में छिपे इन सब गृढ़ नियमों को जानने वाले पंडित महाशय ने जब शशिशेखर को भेटकी (एक प्रकार की मछली) नाम दिया तब वह बहुत दुखी हो उठा। ख़ासकर उस नामकरण में उसके चेहरे की तरह खास इशारा है जानकर उसकी आन्तरिक पीड़ा दुगुनी हो उठी, फिर भी शान्त भाव से सब कुछ सहकर चुप रहकर बैठना पड़ा।
आशु का नाम था गिन्नी, पर उसके साथ थोड़ा इतिहास जुड़ा था।
आशु बेचारा पूरी क्लास में सबसे शरीफ था। किसी से कुछ नहीं कहता था, बहुत शरमीला था; लगता है उम्र में भी सबसे छोटा था, सब बातों में सिर्फ धीरे- धीरे मुस्कराता रहता था; अच्छी तरह पढ़ता था; स्कूल के बहुत-से लड़के उससे दोस्ती करने को तैयार रहते थे पर वह किसी लड़के के साथ नहीं खेलता था, और छुट्टी होते ही पलभर की देरी किए बिना घर चला जाता था।
पत्ते के दोने में दो-एक मिठाई और काँसे के छोटे-से लोटे में पानी लेकर ठीक एक बजे घर से दासी आती थी। आशु को इससे बहुत शर्म आती थी; दासी के लौटने पर उसकी जान में जान आती थी। वह स्कूल का छात्र होने के अलावा भी कुछ है, यह स्कूल के लड़कों के सामने व्यक्त करना उसे अच्छा नहीं लगता था। वह घर का कुछ है, माँ-बाप का बेटा है, भाई-बहनों का भाई है, यह जैसे गुप्त बात है, यह वह साथियों को बताना नहीं चाहता था, उसकी यही कोशिश रहती थी।
पढ़ाई-लिखाई के बारे में उसमें कोई कमी नहीं थी, सिर्फ कभी-कभी क्लास में आने में देर हो जाती थी, और शिवनाथ पंडित जब इसका कारण पूछते तो वह कोई ठीक जवाब नहीं दे पाता था। इसलिए बीच-बीच में उसकी बहुत भर्त्सना की जाती थी। पंडित उसे घुटनों पर हाथ रखकर पीठ नीची करके बरामदे में सीढ़ियों के पास खड़ा कर देते थे; चारों क्लासों के लड़के उस शरमीले अभागे बच्चे को इस स्थिति में देखते थे।
एक दिन ग्रहण की छुट्टी थी। उससे अगले दिन स्कूल आकर पंडितजी महाराज चौकी पर बैठे और दरवाज़े की तरफ देखा,