"हश्र देख कर" presented by Shobhit Kashyap.
"हश्र देख कर मेरा वोह मुझसे मिलने आई हैं,
कोई उनसे भी तो पूछो भला क्यों आईं हैं।
और कसमें तो हमने संग खाई थी ना, "न मिलने की"
अब क्या इस कसम को भी तोड़ने आईं हैं।
गुलाब दे कर जो हर बार अपने इश्क़ का इजहार करते हो,
सच बताओ क्यों तुम मुझसे इतना प्यार करते हो।
और अगर करते ही हो इतनी मोहब्बत मुझसे,
तो भीड़ में एकसर क्यों इस बात से इंकार करते हो।
यूं जला दिए तेरे खत सारे,
बस कुछ सब्दो को सम्भाल के रखा है।
जान तो चली गई थी संग ही तेरे ना,
ये तो बस सासे है जो तेरी यादों से टीका के रखा है।
और रातों को मुझमें सिमटने की आदत थी ना तुझको,
तो अब तेरे बाद तेरे तकिये को खुद से लगा रखा है।
इश्क़ को जो बेफिजूल बतलाने लगे हो,
सच बताओ किसे यादों से मिटाने लगे हो।
और तब जो खामोशियों में को मिलती थी सांसे,
अब तो तुम खुद सांसे से घबराने लगे हो।"