"हमेशा देर कर देता हूँ।" ये एक अकेली नज़्म है जिसमें ज़िन्दगी का वो हिस्सा है जहाँ से हो कर हर कोई गुजरता है। मुनीर नियाज़ी तो एक जगह ये भी लिखते हैं-
आदत सी बना ली है तुमने तो 'मुनीर' अपनी
जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना
मतलब कितनी आसानी से हर हिस्से को बयाँ करना है कोई आपसे सीखे।