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एक छोटे शहर की डॉक्टर की ओपीडी में आई लक्ष्मी — तीन बेटियों की माँ — फिर से गर्भवती है और अपने चौथे बच्चे का लिंग जानने की गुहार लगाती है। क़ानून की बंदिशें, सामाजिक ताने, और एक बेपरवाह पति के साए में वह टूट चुकी है। यह कहानी सिर्फ़ एक मरीज़ की नहीं, बल्कि उस समाज की है जहाँ बेटी होना अब भी एक बोझ समझा जाता है। एक डॉक्टर के रूप में उसका संघर्ष, एक औरत के रूप में उसकी पीड़ा… और एक सवाल — क्या हर बार क़ानून इंसानियत का साथ देता है?
By Diksha Goyalएक छोटे शहर की डॉक्टर की ओपीडी में आई लक्ष्मी — तीन बेटियों की माँ — फिर से गर्भवती है और अपने चौथे बच्चे का लिंग जानने की गुहार लगाती है। क़ानून की बंदिशें, सामाजिक ताने, और एक बेपरवाह पति के साए में वह टूट चुकी है। यह कहानी सिर्फ़ एक मरीज़ की नहीं, बल्कि उस समाज की है जहाँ बेटी होना अब भी एक बोझ समझा जाता है। एक डॉक्टर के रूप में उसका संघर्ष, एक औरत के रूप में उसकी पीड़ा… और एक सवाल — क्या हर बार क़ानून इंसानियत का साथ देता है?