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नदी के कई रूप है। कभी वो शोख़ है। कभी चंचल है, कभी अल्हड़, कभी मचलती है बलखाती है कभी ख़ामोश -चुपचाप है! नदी के कई रूपों स्वरूपों से परिचय करवा रही है मुकुल तिवारी।
आवाज़ तथा आलेख - मुकुल तिवारी
कविताएँ - डा. उषा किरण, साधना वैद
तकनीकी सहायता - अमित तिवारी
आर्ट वर्क - मनुज मेहता, अमित तिवारी
By Radio Playback Indiaनदी के कई रूप है। कभी वो शोख़ है। कभी चंचल है, कभी अल्हड़, कभी मचलती है बलखाती है कभी ख़ामोश -चुपचाप है! नदी के कई रूपों स्वरूपों से परिचय करवा रही है मुकुल तिवारी।
आवाज़ तथा आलेख - मुकुल तिवारी
कविताएँ - डा. उषा किरण, साधना वैद
तकनीकी सहायता - अमित तिवारी
आर्ट वर्क - मनुज मेहता, अमित तिवारी