Sahityalaya

कहानी | गुल्ली-डंडा | मुंशी प्रेमचंद


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दो बचपन के दोस्त जब बीस साल बाद मिलते हैं । पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। इन्हीं यादों का हिस्सा था ‘गुल्ली-डंडा’ का खेल। पुनः वह गुल्ली-डंडा खेलने का निर्णय लेते हैं। लेकिन  उन्हें महसूस होता है कि अब सबकुछ बदल चुका है। इसी बदलाव को इस कहानी में दिखाया गया है।

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SahityalayaBy Sachin Gangwar