माँ और मिट्टी की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। बदलते परिवेश और शहरीकरण के अंधानुकरण में बहुत कुछ है जो वक्त के चलते दाँव पर लगा दिया गया। रिश्ते, नाते, अपनापन, अपनी ज़मीन, अपना घर उससे जुड़ी यादें, बहुत कुछ ऐसा था, जिसमें ज़िंदगी समाहित थी। अब लोग ज़िंदा तो है लेकिन क्या सही मायने में ज़िंदगी से सराबोर हैं?