PURE ZINDAGI

मां - चंद पंक्तियां


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मां

देखो ना! साल हो गया!

तुम आई तो थी यहां एम्बुलेंस से,

कभी सपने में भी नहीं सोचा था,

खुद अपने पैरों पर चलकर नहीं

बल्कि जाओगी भी उसी एम्बुलेंस से।

हर उगते सूरज के साथ

उम्मीदें भी जगती थीं,

तुम आज तो साथ घर चलोगी...

लेकिन हर शाम

तुम्हारी बिगड़ती हालत के साथ

अंदर से उम्मीदें डूबती रहीं,

जिसे शायद कभी मैंने

ख़ुद से भी ज़ाहिर नहीं किया।

ज़्यादा नहीं कहूंगी...

बस माफ करना माँ...

तुम्हें सही-सलामत

हॉस्पिटल से डिस्चार्ज नहीं करा पाई!

और यहीं पूरे परिवार के साथ

एक छत के नीचे रहने का

मेरा इकलौता सपना

अधूरा रह गया!

ख़ैर तुम जहां भी हो...

अब तो अपना ख़याल रखना...

वादा रहा...हम फिर मिलेंगे!

#माँ

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PURE ZINDAGIBy Manoj Srivastava। TV host । Centrist