गिरने के बाद जो हमारे आंसू पूंछ हमें फ़िर खड़ा होना सिखाती है, खुद भूख से लिपटी पड़ी हो चाहे पर सब हम पर न्योछावर कर जाती है। उनके त्याग को समेंटना तो मुमकिन नहीं, पर कुछ अर्पण करने की कोशिश की है।
गिरने के बाद जो हमारे आंसू पूंछ हमें फ़िर खड़ा होना सिखाती है, खुद भूख से लिपटी पड़ी हो चाहे पर सब हम पर न्योछावर कर जाती है। उनके त्याग को समेंटना तो मुमकिन नहीं, पर कुछ अर्पण करने की कोशिश की है।