इस धरा में सब गोल है, गोल होना शून्य को भी इंगित करती है। पूरे विश्व के नाथ स्वयं शून्य के स्वामी हैं और हम अपने आप को उसी शून्य से दूर रखने की कोशिश में आदरणीय समझते हैं।
दरअसल शून्य की ओर जाना ही चरम आनन्द का मार्ग है। शिव हम में समाएँ और हम भी शून्य हो जाएँ। महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ।