Writen and voice by - Deepak mahapatre. मसर्रत
ये तुमारी कुर्बत ये मेरे मोहब्बत जवां रहे,
खिलखिलाती बस्ती मेरी मसर्रत रवां रहे,
कुछ बातें रिवायती कुछ बातें पुरानी रहे,
ज़िन्दगी की एक साल की और एक कहानी रहे,
उड़ गए परिंदे अपने नए ठिकाने पर
हौसले पुराने बातें ले नए जमाने पर,
आज भी याद है मुझे वो किस्से बचपन के
शरारती दौर माँ के थपकियाँ बचपन के,
रातों के नींद में ख़्वाब बड़े सच्चे थे,
कच्ची रेत पर झिलमिलाती महल अच्छे थे,
मसर्रत अक्षर ढेला स्याही में था,
कागज़ की कश्ती पक्के सुराही में था,
चिलचिलाती धूप नंगे पैर वो आम कच्चे थे
बड़ा उम्र याद करते हैं कभी हम भी बच्चे थे,
बड़े प्यार से संझौता हूं में अपनी किए बेमानी को
इन मसरूफ़ भीड़ में भूल जाता हूँ मैं अपनी कहानी को,
बड़े सान ए शौक़त से मानता हूँ अपनी बीती ज़िन्दगानी को
उठे धुएं दीपक तले मौत आग़ोश रवानी को।