नमस्कार दोस्तों
मैं सुमन राकेश शाह( Ruhaani poetry) आज फिर आपके साथ हूँ मेरी आवाज़ मेरे अल्फाज़ में और आज मैं बात करुँगी "मन" की … आज मन नहीं है, आज मेरा मन उदास है, आज मन नाच रहा है किसी ज्ञानी ने तो ये भी कहा है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत…. तो आज हम उसी मन की बात करेंगे
मैने अपने दिल को ही
सवालों के कटघरे में खडा कर दिया
क्योंकि थक चुकी हूँ उसकी मनमर्ज़ी से
कभी तो सुने ये दिमाग की,
दिमाग अपने अनुभव से कुछ कहता है
और ये दिल चोट खाकर भी पिघल जाता है
स्थिर रहना गलत नही है,
मजबूत बनना और दिखना दोनो ही
वक़्त और हालात होते है
जिन्हे सभी को स्वीकारना होता है...सुमन
अनगिनत इच्छायें मन की,
अंधे कुँए सी, जितनी पूरी करो
नई सर उठाती है, फिर भी..
मन की खुशी कहाँ मिल पाती है
देर हो उससे पहले जागना होगा
इस आब ए सराब को समझना होगा..सुमन
जब जो चाहा, पाया मगर फिर भी
ख्वाहिशों की फहरिस्त कम न हुई ..… सुमन
जिन्दगी मे हमेशा ही कुछ अधूरा रहा
जब अपने अंतर में झाँका तो
वहाँ खुद को मुक़म्मल ही पाया… सुमन
बात नही करनी तो
कुछ नही, बस ज़रा सा मुस्कुरा दो
सुना है इक हल्की मुस्कान से
रिश्तें और दिल चटकने से बच जाते है..सुमन
हार के पीछे जो संघर्ष
और सबक छुपा है वहीं
तुम्हारी जीत का आगाज़ है
..… सुमन