ज्ञानरंजन अपनी कहानी ‘पिता’ में पिता-पुत्र संबंधों के यथार्थ को अपनी पूर्ववर्ती कहानियों की तुलना में काफी अलग ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पुत्र उमस भरी गर्म रात में घर लौटा, उसने आध पल को बिस्तर का अंदाजा लेने के लिए बिजली जलाई। बिस्तर फर्श पर ही पड़े थे। पत्नी ने सिर्फ इतना कहा कि ‘आ गये’ और बच्चे की तरफ करवट लेकर चुप हो गयी।
वातावरण बहुत गर्म है। गर्मी की वजह से कपड़े पसीने में पूरी तरह से भीग चुके हैं। घर में सभी लोग सो चुके है घर के भीतर सिर्फ वही जागा है। घर में अगर पुत्र जागा है तो बाहर पिता भी जागे हुए हैं। रोती बिल्ली को देख पिता सचेत हो गये और उन्होंने डंडे की आवाज़ से बिल्ली को भगा दिया। जब वह घूम फिर कर लौट रहा था तब भी उसने कनखी से पिता को गंजी से अपनी पीठ खुजाते देखा था। लेकिन वह पिता से बचकर घर में घुस गया। पहले उसे लगा कि पिता को गर्मी की वजह से शायद नींद नहीं आ रही लेकिन फिर एकाएक उसका मन रोष से भर गया क्योंकि घर के सभी लोग पिता से पंखे के नीचे सोने के लिये कहा करते हैं लेकिन पिता हैं कि सुनते ही नहीं।
कुछ देर वह अपने बिस्तर पर ही पड़ा रहा फिर कुछ देर बाद उत्सुकतावश उठा और उसने खिड़की से बाहर देखा। पिता बेचैन थे सड़क की बत्ती बिल्कुल उनकी छाती पर पड़ रही थी वे बार-बार करवट बदल रहे थे। फिर कुछ देर बाद उठकर पंखा झलने लगे। इसके बाद पिता उठकर चौकीदारों की तरह घर के चारों ओर घूमने लगते हैं। पुत्र को यह सब अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ़ लगता है। उसे लगता है कि इससे पिता मोहल्ले में हमारे सम्मान को ठेस पहुँचा रहे हैं। वह कमरे की दीवार से पीठ टिकाकर तनाव में सोचने लगता है। बिजली का मीटर तेज चल रहा है सब लोग आराम से पंखे के नीचे सो रहे हैं लेकिन पिता की रात कष्ट में ही बीत रही है। पिता जीवन की अनिवार्य सुविधाओं से भी चिढ़ते है क्यों? पिता चौक से आने के लिये रिक्शे वाले से चार आने मांगने पर तीन आने और तीन आने माँगने पर दो आने लेने के लिये काफी चिरौरी करते हैं। घर में वॉश वेसिन है पर वे बाहर जाकर बगियावाले नल पर ही कुल्ला-दातुन करते हैं। गुसलखाने में खूबसूरत शॉवर होने के बावजूद पिता को आँगन में धोती को लंगोट की तरह लपेटकर तेल चुपड़े बदन पर बाल्टी भर-भर पानी डालना ही भाता है। इसलिये वह पिता पर ही झल्लाने लगता है।
लड़कों द्वारा बाजार से लाई गयी बिस्किटें, मेहँगे फल पिता कुछ भी नहीं लेते। कभी लेते भी हैं तो बहुत नाक-भौं सिकोड़कर। बाहर पिता ने लड़ते चिचियाते कुत्तों को भगाया। वह पिता के व्यवहार से फिर दुखी हो गया। उसने कितनी बार पिता से कहा कि मुहल्ले में हम लोगो का सम्मान है आप भीतर सोया कीजिये। अच्छे कपड़े पहना कीजिये और बाहर पहरा मत दिया कीजिए ये सब बहुत भद्दा लगता है पर पिता इन सब बातों पर कोई ध्यान नहीं देते। कितना भी बढ़िया कपड़ा लाकर दो और कहो कि इसे किसी अच्छे दर्जी से सिलवा लो तो भी वे मुहल्ले के ही किसी भी सामान्य से दर्जी से कमीज कुरता सिलवा लेते हैं। इस पर पिता के अपने तर्क हैं। घर के लोग पिता के इस व्यवहार को देखकर हर बार प्रण लेते है कि वे अब पिता को उनके हाल पर छो़ड़ देंगे लेकिन कुछ समय बाद फिर से पिता के लिये सबका मन उमड़ने लगता है।
वह इन सब बातों को भुलाना चाहता था उसने सोने की इच्छा की पर खुद को असहाय पाया। फिर उसने अपनी पत्नी देवा के बारे में सोचने की, उसके शरीर को स्पर्श करने की इच्छा मन में की ताकि उसका ध्यान पिता से हट सके पर देवा के कुल्हे को स्पर्श कर भी वह अपने भीतर उत्तेजना पैदा नहीं कर सका। वह पिता के लिये द्वंद्व की स्थिति से भर जाता है। एक स्तर पर उसे पिता बड़े हठी दंभी और अहंकारी लगते हैं लेकिन दूसरे ही क्षण उसे लगता है कि पिता लगातार विजयी है। कठोर है तो क्या,उन्होंने पुत्रों के सामने अपने को कभी पसारा नहीं। वह इन सब बातों को सोचकर गौरवांवित और लज्जित दोनों विरोधाभासी अवस्थाओं को महसूस करता है। एक बार उसके मन में आया की वह पिता को आग्रहपूर्वक भीतर आकर पंखे में सोने के लिये कहे लेकिन वह ऐसा न कर सका। पूरी रात जागने के बाद अलसुबह उसकी नींद काफूर हो चुकी थी उसने पिता को देखा। पिता सो नही गये है अथवा कुछ सोकर पुनः जगे हुए है। पता नहीं। अभी ही उन्होंने हे राम कहकर जम्हाई ली है। पिता उठे उन्होंने अपना बिस्तर गोल करके एक सिरहाने पर रखा और खाट की बाध को पानी से तर किया और पंखा झलने लगे। तड़का होने में अभी देर थी। वह खिड़की से हटकर बिस्तर पर आया। अंदर हवा वैसी ही लू की तरह गर्म है। दूसरे कमरे स्तब्ध हैं पता नहीं बाहर भी उमस और बेचैनी होगी। वह जागते हुए सोचने लगा, अब पिता निश्चित रूप से सो गये हैं शायद।
‘पिता’ ज्ञानरंजन की महत्वपूर्ण कहानियों में से एक है।