सकारात्मक दिमाग खिले हुए फूल की तरह होता है
कल्पना करें कि आप फूल की पंखुड़ी हैं। पत्तियां आपके चेहरे के इर्द-गिर्द लिपटी हुई हैं। इस स्थिति में आप सिर्फ रौशनी ही देख सकते हैं। आपको कुछ और नहीं दिख रहा, इसलिए अपने आसपास की चीजों को ना महसूस कर सकते हैं, ना उनकी सराहना कर सकते हैं। ज्यों ही सूरज को रौशनी आप पर पड़ती है, उस गर्माहट से पंखुड़ी खिलकर फूल बन जाती है। सकारात्मकता इसी रौशनी की तरह है। और इससे ही हमारे दिमाग के विचार खुलते हैं। कुछ फूल कभी-कभी खिलते,
हैं। कुछ तो सिर्फ एक बार व कुछ फूल जैसे लिली धूप रोज खिल उठते हैं। पौधों को धूप की जरूरत होती है। इस बात को जानते हैं इसब्जिए धूप की दिशा में मुड़ने की यथासंभव कोशिश करते हैं। वैज्ञानिक इसे हैलियोट्रॉपिक इपेक्ट कहते हैं। इसी तरह का इफेक्ट हम इंसानों में भी पाया जाता है। एमआईटी यूनिवर्सिटी की बारबरा फ्रेड्रिक्सन अपनी किताब पॉजिटिविटी में लिए बती हैं- हम ये सहज रूप से जानते हैं कि सकारात्मकता हर व्यक्ति के विकास के लिए जरूरी है इसलिए सकारात्मक रहने की हरसंभव कोशिश करते हैं। ये ब्रॉडन इफेक्ट कहलाता है। ब्रेडीस यूनिवर्सिटी में शोधकर्ताओं में आई ट्रैकिंग तकनीक के जरिए वॉलेंटियर्स पर किए प्रयोग में पाया कि सकारात्मक भावनाओं के साथ व्यक्ति का ध्यान यानी अटेंशन भी बढ़ती है।