समर्पण का चमत्कार
कल्पना करो कि तुम घर पर शांत बैठे हो। अचानक एक अलार्म की तीखी आवाज आती है। तुम्हारे भीतर चिड़चिड़ापन उभरता है। इसका कारण $2 कुछ भी तो नहीं। फिर तुमने उसे भीतर क्यों रचा? तुमने नहीं, इसे मन में रचा अचेतन रूप में किंतु मन ने ही उसे क्यों रचा? क्य मन की अचेतन धारणा ही है प्रतिरोध, जिसका
अनुभव तुम नकारात्मकता या यह सबकुछ एक आध्यात्मिक सकता है। एक प्रयास करी। स्वयं को पारदर्शी होता महसूस करो। मानो भौतिक शरीर अब ठोस नहीं रह गया है। अब मन को शोर या ऐसी ही किसी चीज पर एक नकारात्मक प्रतिक्रिया पैदा करने दो और उसे अपने से होकर गुजरने दो। अब वह किसी ठोस दीवार से नहीं टकरा रहा है। छोटी-मोटी चीजों के साथ अभ्यास करो। गाड़ी का हॉर्न, कुत्ते का भौंकना, बच्चों का चिल्लाना, ट्रैफिक जाम भीतर प्रतिरोध की एक दीवार रखने के बजाय उस सब को अपने से होकर त उपयोग गुजरने दो बिलकुल प्रतिरोध मत करो। जिस क्षण तुम अपनी अशांति को पूरी तरह से स्वीकार कर लोगे, तुम्हारी अशांति शांति में रूपांतरित हो जाएगी। जब तुम स्वयं को वैसे ही स्वीकार कर लेते हो, जैसे तुम हो तो हर क्षण सर्वोत्तम बन जाता है।