परिवार, समाज और संस्कार के चलते व्यक्ति के प्रेम से जुड़ी भावनाओं का दमन और गाहे बगाहे मन के किसी कोने से झांकती वो हसरतें बार बार सिर उठाती है। प्रेम में एक दोहरी ज़िंदगी आज इस देश की आधी से ज़्यादा आबादी का सच है। क्या सहज, सरल, स्नेहिल प्रेम के लिए इस समाज में कोई स्थान है? क्या इन रिश्तों को कोई नाम दिया जा सकता है? ऐसी ही तमाम किस्सो को यह कहानी स्वयं में समेटे है। कहानी अच्छी लगे तो शेर अवश्य करना।