मन की चाहत और हृदय के स्वाभाविक उच्छवास को परंपरा और रीति रिवाजों की भेंट चढ़ने देना और उसके बाद आजीवन एक सहज रिश्ते की कल्पना का अभिशाप झेलना देश के करोड़ों युवाओं की कहानी है। जीवन ढल तो किसी के भी साथ जाता है लेकिन क्या पीड़ित मन अपनी बात कह पाता है? आजीवन कृत्रिम गढ़े सम्बन्धों को न्यायोचित ठहराना और अंत में भाग्य में लिखा होने की कहानी को अपनी नियति मान बैठना, यह सिलसिला सदियों से चल रहा है। रेणु मिश्रा की कहानी इन बारीक रेशों को परत दर परत उघाड़ती है।