https://youtu.be/M7-xxEjcm9Y Sampadak Rabindranath Tagore
संपादक रबीन्द्रनाथ टैगोर
अपनी पत्नी के जीवनकाल में मुझे प्रभा की कोई चिन्ता नहीं थी। तब प्रभा की अपेक्षा उसकी माँ को लेकर ज्यादा व्यस्त रहता था।
उन दिनों सिर्फ प्रभा का खेल, उसकी हँसी देखकर, उसकी टूटी-फूटी बातें सुनकर और प्यार करके तृप्त हो जाता था; जब तक मन करता हिलाता-डुलाता, पर रोना शुरू होते ही उसकी माँ को गोद में सौंपकर उस झमेले से छूट जाता। यह बात कभी मेरे मन में भी नहीं आई थी कि उसे बड़ा करने में बड़ी मेहनत और चिन्ता करनी पड़ेगी।
असमय में मेरी पत्नी की मृत्यु होने पर बेटी माँ की गोद से मेरी गोद में आ पड़ी। मैंने उसे छाती से लगा लिया।
पर मैं ठीक से समझ नहीं पा रहा था कि मैं मातृहीना बेटी को दुगने स्नेह से पालने को अपना कर्तव्य मानकर उसके बारे में ज्यादा सोचता था या वह पत्नीहीन पिता को सँभालने के अपने कर्तव्य के बारे में ज्यादा सोचती थी। छह साल की होते न होते उसने मालकिन का भाव दिखाना शुरू कर दिया। साफ दिखता था कि इतनी- सी लड़की अपने पिता की एकमात्र अभिभावक होने की कोशिश करती थी।
मैंने मन-ही-मन हँसकर उसके हाथों में आत्मसमर्पण कर दिया। देखा, मैं जितना अकर्मण्य और असहाय होता हूँ उसे उतना ही अच्छा लगता है; अगर मैं अपनी धोती तह करके और छाता बन्द करके रख दूँ तो उसके चेहरे का भाव ऐसा हो जाता है जैसे उसके अधिकार में हस्तक्षेप किया जा रहा है। पिता जैसी बड़ी गुड़िया उसे इससे पहले कभी नहीं मिली थी, इसीलिए उन्हें खिला पिलाकर बिस्तर पर सुलाकर वह सारा दिन बहुत खुश रहती थी। केवल हिसाब और साहित्य पढ़ाते समय मेरे पितृत्व को थोड़ा सजग होना पड़ता था।
पर बीच-बीच में यह चिन्ता होने लगती थी कि लड़की को सत्पात्र से ब्याहते समय बहुत पैसों की ज़रूरत होगी--मेरे पास इतना रुपया कहाँ है। लड़की को अपनी सामर्थ्य के अनुसार पढ़ा-लिखा तो दिया, पर अगर एक पूरे बेवकूफ के हाथ में देनी पड़ी तो उसकी क्या दशा होगी।
कमाने की तरफ ध्यान देने लगा। सरकारी दफ्तर में नौकरी की उम्र निकल गई थी, दूसरे ऑफिस में जाने की क्षमता नहीं है। बहुत सोचने के बाद एक किताब लिखने का निश्चय किया।
बाँस की नली में छेद करके तेल या पानी नहीं रखा जा सकता, क्योंकि उसमें कुछ रोक सकने को ताकत ही नहीं रहती; उससे कोई काम नहीं लिया जा सकता, पर फूँक मारते ही बिना किसी ख़र्च के बाँसुरी अच्छी बजती है। मैं अच्छी तरह जान गया था कि जिस हतभागे की दुनिया के किसी काम में अकल नहीं चलती, वह अच्छी किताब जरूर लिख लेगा। इसी हिम्मत पर मैंने एक प्रहसन लिखा, जो लोगों ने अच्छा कहा और रंगभूमि पर अभिनय भी हुआ।
अचानक यश का स्वाद पाकर ऐसी मुश्किल हो गई कि किसी तरह प्रहसन लिखने का मोह नहीं छोड़ पाता था। पूरा दिन व्याकुल चिन्तित मुख से प्रहसन लिखने की चेष्टा करता रहता था। प्रभा आकर बड़े प्यार से स्नेहपूर्ण हँसी के साथ पूछने लगी, 'बाबा, नहाने नहीं जाओगे ?' मैं खीझकर बोला, 'अभी जा, जा, अभी तंग मत कर ।'
बच्ची का चेहरा फूँक से बुझाये गए दीपक की तरह काला हो गया होगा; कब वह अभिमान से भरी छाती लिए चुपचाप कमरे से बाहर चली गई मुझे पता भी नहीं चला।
दासी को भगा देता हूँ, नौकर को मारने को उठता हूँ, भिखारी गाता-गाता भीख माँगने आता है तो लाठी दिखाकर भगाता हूँ। मेरा घर सड़क के किनारे पर है इसलिए अगर कोई बेचारा पथिक खिड़की के बाहर से मुझसे रास्ता पूछे तो उसे जहन्नुम में जाने को कहता हूँ। हाय, कोई नहीं समझता था कि मैं एक बहुत मज़ेदार प्रहसन लिख रहा था।
पर लिखने में जितना मज़ा आ रहा था और जितना यश मिल रहा था उतने पैसे नहीं मिल रहे थे। तब पैसों की बात मन में भी नहीं आ रही थी। इधर प्रभा के योग्य बर दूसरे शरीफ लोगों को उनकी कन्या के दायित्व से मुक्त करने के लिए समृद्ध परिवारों की तरफ बढ़ने लगे, इस तरफ मेरा ध्यान भी नहीं गया।
पेट में आग लगे बिना होश नहीं रहता था, पर इन्हीं दिनों एक अच्छा मौका मिला । जाहिर गाँव के जमींदार ने एक अखबार निकाला और मुझसे उसका वेतनभोगी संपादक बनने का अनुरोध किया। मैंने काम ले लिया और कुछ इतने जोश से लिखने लगा कि सड़क पर चलता था तो लोग उँगली से इशारा कर मुझे दिखाते थे और मैं अपने को मध्याह्न की तपन के समान तीव्र समझने लगा जिसे दूसरे देखने में असमर्थ थे।
जाहिर गाँव के पास ही आहिर गाँव था। दोनों गाँवों के जमींदारों में बहुत होड़ा- होड़ी थी। पहले बात-बात पर लाठी चलती थी। अब दोनों पक्षों ने मजिस्ट्रेट को मुचलका देकर लाठी बंद कर दी और मुझ बेचारे भगवान के जीव को खूनी लठैतों की जगह नियुक्त कर दिया। सभी कहने लगे कि मैंने अपनी पदमर्यादा की रक्षा की।
मेरे लिखने से परेशान आहिर गाँव सिर नहीं उठा पा रहा था। मैंने उनके जाति