कर्म की स्वतंत्रता
कुछ लोग कहते हैं सारे कर्म ईश्वर की इच्छा से कुछ कहते हैं नहीं, मनुष्य के प्रयत्न या पुरुषार्थ से इस संबंध में वेदांत कहता है कि यदि दूरदर्शिता पूर्वक देखा जाए तो इन दोनों बातों में कुछ भी अंतर नहीं है। अंतर केवल उन दृष्टियों में है, जो वास्तविकता तक नहीं पहुंचती। वेदांत बल्कि लोगों से प्रश्न करता है कि आप ईश्वर का क्या स्वरूप मान बैठे हैं- निराकार या साकार, शरीर के स्वामी की भांति कर्ता पुरुष है या केवल अकर्ता। यदि आप इन प्रश्नों का उत्तर दे देंगे, तो इस ग्रंथि का भेद अपने आप ही खुल जाएगा।
मनुष्य में दो शक्तियां मौजूद हैं- एक स्वतंत्र अर्थात कर्म करने की शक्ति और दूसरी परतंत्र। अब यह देखना चाहिए कि मनुष्य कहाँ तक आजाद है और कहां तक गुलाम कहां तक मनुष्य में स्वतंत्रता अर्थात कर्म करने का अंश है और कहां तक, उसमें पराधीनता यानी प्रारब्ध का अंश है। जैसे रेशम के कीड़े का हाल है कि जब तक उसने अपने भीतर से रेशम नहीं निकाला, तब तक वह स्वतंत्र है और स्वेच्छाचारी कहा जाता है, मगर जब रेशम निकाल चुकता है तो फंस जाता। है, परतंत्र कहलाता है। इसी तरह जो मनुष्य कर्म कर चुका है, उसका फल भोगने के लिए पराधीन है, मगर
जब कर्म किया ही नहीं, उसके लिए वह स्वतंत्र है। - 'स्वामी रामतीर्थ के सदुपदेश किताब से साभार