तत्कालीन परिस्थितियाँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं, कि इतने झंझावात भरे जीवन का क्या औचित्य है? क्या हमारी महत्वाकांक्षाएँ हमारे अपनों से बड़ी हैं? आखिर क्या मायने हैं इस जीवन के? अंततोगत्वा बचेंगे, तो सिर्फ ये शिलालेख ही ना!
तत्कालीन परिस्थितियाँ हमें यह सोचने पर विवश करती हैं, कि इतने झंझावात भरे जीवन का क्या औचित्य है? क्या हमारी महत्वाकांक्षाएँ हमारे अपनों से बड़ी हैं? आखिर क्या मायने हैं इस जीवन के? अंततोगत्वा बचेंगे, तो सिर्फ ये शिलालेख ही ना!