MSUVACH

संगत


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जीवन में कई बार ऐसा होता है कि हम परिस्थितिवश या फिंर बाहर की दुनिया की चकाचौंध में पड़कर ख़ुद को अपने मूल स्वभाव से अलग कर लेते हैं और नकारात्मक माहौल में शामिल हो जाते हैं। हमारे भीतर का ज़ोश और ज़ुनून धीरे-धीरे ख़त्म हो जाता है। एक पल ऐसा भी आता है, जब हमें लगने लगता है कि अब कुछ नहीं हो सकता सब ख़त्म हो चुका है। लेकिन यदि हम अपने भीतर की ताक़त को समेटकर एक बार उस नकारात्मक संगत से ख़ुद को निकालकर सकारात्मक माहौल में लाने का साहस कर लें तो सब कुछ दुबारा से ठीक हो सकता है।

क्योंकि ठोकर लगने का मतलब यह नहीं कि आप चलना ही छोड़ दें। बल्कि ठोकर लगने का मतलब है, सम्भल के चलें।

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MSUVACHBy Manoj Shrivastava