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"मेरे हिसाब से आलोचना और साहित्य दोनों ही 1 दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब आलोचना ईमानदारी से की जाए और अच्छे से की जाए तो यह साहित्य को और बेहतर बनाने का मौका देती है। नए नजरिए दिखाती है और लेखक को सुधरने का। 1 लेखक को अपनी चीज को और सुधारने का या और भी अच्छा बनाने का अवसर मिलता है। लेकिन जब आलोचना पॉलिटिकल से प्रभावित हो, पॉलिटिक से प्रभावित हो या बायस हो तो ये साहित्य को नुकसान भी पहुंचा सकती है। आजकल कई बार आलोचना 1 एजेंडा बन कर की जाती है, जिसमें साहित्य की असली वैल्यु खो जाती है।"