Shayari

Subha Subha Ek Khwaab Dekha


Listen Later

Subha Subha Ek Khwaab Dekha



सुब्ह सुब्ह इक ख़्वाब की दस्तक पर दरवाज़ा खोला' देखा


सरहद के उस पार से कुछ मेहमान आए हैं


आँखों से मानूस थे सारे



चेहरे सारे सुने सुनाए


पाँव धोए, हाथ धुलाए


आँगन में आसन लगवाए



और तन्नूर पे मक्की के कुछ मोटे मोटे रोट पकाए



पोटली में मेहमान मिरे



पिछले सालों की फ़सलों का गुड़ लाए थे



आँख खुली तो देखा घर में कोई नहीं था



हाथ लगा कर देखा तो तन्नूर अभी तक बुझा नहीं था


और होंटों पर मीठे गुड़ का ज़ाइक़ा अब तक चिपक रहा था



ख़्वाब था शायद!


ख़्वाब ही होगा!!



सरहद पर कल रात, सुना है चली, थी गोली


सरहद पर कल रात, सुना है


कुछ ख़्वाबों का ख़ून हुआ था,

...more
View all episodesView all episodes
Download on the App Store

ShayariBy Manoj Agarwal