जैसे कस्तूरी मृग के नाभी में कस्तूरी होती है और वो उसे बाहर खोजता रहता है वैसे ही आदमी का सुख भी उसी के अंदर होता है ।उसे दूसरों में नहीं खुद में ही तलाशे ये भाई वीरेंद्र सिंह बैंस जी के संकलन से मालूम पड़ता है।
जैसे कस्तूरी मृग के नाभी में कस्तूरी होती है और वो उसे बाहर खोजता रहता है वैसे ही आदमी का सुख भी उसी के अंदर होता है ।उसे दूसरों में नहीं खुद में ही तलाशे ये भाई वीरेंद्र सिंह बैंस जी के संकलन से मालूम पड़ता है।