आज भी अलमारी में तेरी यादें समेट कर रखी है
अब धूल जम गई हैं उन पर
गुजरते वक्त के साथ
ये जो इश्क का रोग था
उस से शिफा हो गया हूं मैं अब
तुम्हारे लौटने का कब तक इंतजार करते
ये आंखे भी थक गई हैं
मोहब्बत का बोझ सहते सहते
इल्म हैं अब बस हिज्र रातों का
अब इस दिल को वस्ल के राहत के दिन नही मिल ते