दोस्तो मैं सुमन राकेश शाह इक बार फिर आपके साथ हूँ meri आवाज, मेरे अल्फाज़ में…और आज लेकर आई हूँ "तुम्हारे बिन"
2020 में जब कोरोना आया था तब डरे सहमे घरों में सुरक्षित थे हम मगर इन तीन सालों में हमने कितने अपनों को खोया है और वो भी all of sudden.… और अब तक वहीं सिलसिला चल रहा है,
उसी भाव के साथ कुछ पंक्तिया लिखी है
तुम्हारे बिना सब ज्यों का त्यों है
फिर ये दिल इतना उदास क्यों है
दुनिया तो वही की वही फिर
ये सूना सूना सा हमारा जहां क्यूं है,
चाहते है हँसना खिलखिलाना फिर से
मगर दिल की ये बंदिशे क्या है,
यादें तुम्हारी दिल मे बसा के
चलना जरा मुश्किल है
साथ वो घड़ी भर का था
मगर यादें अनंत है
जानतें तो हम भी है कि
इक दिन चले ही जाना है सब को
फिर ये दिल इतना उदास क्यूं है ।
तुम्हारे बिना ये जग सूना सूना क्यूं है...सुमन